Mahabharat in Hindi PDF Download |सम्पूर्ण महाभारत हिंदी में Pdf

Mahabharat in Hindi PDF महाभारत भारत का एक पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रन्थ है। महाभारत ( Mahabharat Story PDF ) की रचना महर्षि वेद व्यास जी ने की है और भगवान श्री गणेश जी ने संस्कृत में लिखा है। इस काव्य में महर्षि वेद व्यास जी ने वेदोंवेदांगों और उपनिषदों के गूढ़ रहस्य का निरूपण किया है।

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महाभारत में कितने पर्व हैं ?

मित्रों जो भी महाभारत ( Mahabharata PDF ) में वर्णित है वह संसार में आपको कहीं ना कहीं परिलक्षित होगा अवश्य होगा। पूरे महाभारत में लगभग 1,10,000 श्लोक है। महाभारत काव्य जय, भारत और महाभारत नाम से प्रसिद्ध है। Mahabharata में कुल 18 पर्व है।

महाभारत काव्य के कुल 1948 अध्याय है। महाभारत को शत सहस्त्र संहिता भी कहा जाता है। महाभारत में वर्णित स्थल आज भी इसकी वास्तविकता को प्रमाणित करते है।

महाभारत ( Mahabharat PDF ) में 18 अंक का बहुत महत्व है। महाभारत में 18 पर्व है। भगवद्गीता  में 18 अध्याय है। भगवान श्री कृष्ण जी ने महान धनुर्धारी अर्जुन को 18 दिन तक ज्ञान दिया था।

कौरवों की 11 अक्षोहिणी और पांडवों की 7 अक्षोहिणी मिलाकर 18 अक्षोहिणी सेना थी। महाभारत युद्ध 18 दिन तक चला था और युद्ध की समाप्ति पर 18 योद्धा ही जीवित बचे थे। महाभारत के अनुसार “अपनी दृष्टि सरल रखो कुटिल नहीं, सत्य बोलो झूठ नहीं, दूरदर्शी बनो अल्पदर्शी नहीं।  “

महाभारत के बारे में गांधीजी के कथन Mahabharat PDF in Hindi  

 Mahabharata बारे में Gandhi Ji ने कहा है, ”  जब भी मुझे घोर निराशा होती है, मैं अविलम्ब भगवद्गीता  के पास जाता हूँ और उसके श्लोकों को पढ़ते ही निराशा के बादल ऐसे छंट जाते है, जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार दूर हो जाता है।

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महाभारत की आवश्यक बातें ( महाभारत के रहस्य ) Mahabharat in Hindi

महाभारत में कुछ ऐसी बतो का उल्लेख हुआ है जिसे मनुष्य जीवन में ग्रहण कर ले तो उसकी हर कार्य में जीत सुनिश्चित है।

2) निर्णय लेने से पहले – मनुष्य को अपने जीवन में स्वतः ही निर्णय लेना चाहिए न कि दूसरे के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए। दूसरे के निर्णय को स्वीकार करने का मतलब आप खुद को उसके आधीन कर देते है। महाभारत में कई पात्र खुद निर्णय न लेकर दूसरे आधीन निर्णय को स्वीकारते है। इसलिए स्वयं निर्णय लेने में सक्षम होना चाहिए। अपने विवेक और संयम से निर्णय लेना खुद के साथ ही अन्य लोगो का भी हित करता है।

3) खुद पर यकीन करना चाहिए – धृतराष्ट्र ने जिस प्रकार से गद्दी प्राप्त किया और दुर्योधन ने चतुराई के साथ सत्ता अपने हाथ में ले लिया था। इसलिए ही इतना बड़ा महाभारत हुआ। अगर धृतराष्ट्र स्वयं निर्णय लेते और खुद पर यकीन करते दोनों पक्षों को नुकसान से बचाया जा सकता था। इसलिए स्वयं पर विश्वास करना आवश्यक है।

4) डर को दूर भगाना – महाभारत में जीवन के हर पहलू को दर्शाया गया है जिनमे ‘डर’ का भी समावेश है। धृतराष्ट्र को अपनी गद्दी जाने का डर था। कर्ण को अपनों के विरुद्ध युद्ध का डर था तो दुर्योधन को अपनी और सेना को पांडवो के द्वारा हार जाने का डर था। इससे सीख मिलती है कि मनुष्य ‘डर’ के वस में होने पर कोई निर्णय सही नहीं ले पाता है। ‘डर’ में लिया हुआ निर्णय बाद में पछतावे का कारण बन जाता है।

महाभारत कथा Mahabharat Katha

जो कुछ भी जीवन में घटित होता है उसे विधाता ने पहले से ही मनुष्य की जीवनी में लिखा हुआ होता है। उसी के अनुसार ही मनुष्य अपने जीवन में चलने के लिए बाध्य हो जाता है।

रामायण और महाभारत की कथाओ में भी इन बातो का उल्लेख है। इसीलिए रामायण और महाभारत में ईश्वर के अवतार होते हुए भी भगवान को भी विधाता के द्वारा लिखे हुए मार्ग पर चलना पड़ा था।

तभी कही से मधुसूदन के साथ गांडीव धारी अर्जुन अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर का कुशल क्षेत्र जानने के लिए आ पहुंचे। युधिष्ठिर लज्जित होकर अपने निवास में आ गए थे।

अर्जुन और गोविन्द को देखकर युधिष्ठिर को लगा शायद अर्जुन ने कर्ण को पराजित कर दिया और उनके अपमान का बदला ले लिया। लेकिन ऐसा नहीं हुआ था।

यह जानकर युधिष्ठिर ने अर्जुन को अपना अस्त्र शस्त्र किसी और को देने के लिए कह दिया था। किसी क्षत्रिय को अपने शस्त्र का अपमान बर्दाश्त नहीं होता है और अर्जुन को भी अपने शस्त्र का अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ।

अर्जुन ने क्रोध में भरकर युधिष्ठिर का वध कर देने के लिए उद्यत हो उठा। लेकिन वहां अर्जुन के सारथी और सखा माधव उपस्थित थे। उन्होंने अर्जुन को यह अनर्थ करने से रोक दिया।

श्री कृष्ण ने तब अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन, एक हारा हुआ व्यक्ति तो मृतक के स्वरूप में होता है। इसलिए तुम युधिष्ठिर को मत मारो।”

तब माधव के कहने से ही अर्जुन ने युधिष्ठिर को अपशब्द कहकर छोड़ दिया था।

उलझे हुए रिश्ते Mahabharat Story in Hindi

महाभारत में कई जगह कुछ ऐसे रिश्ते है जो उलझे हुए है। अर्जुन ने श्री कृष्ण की बहन से गंधर्व विवाह किया हुआ था। अभिमन्यु सुभद्रा का ही पुत्र था।

इस सभी बातो पर गौर करने से अवश्य ही सब कुछ उलझा हुआ प्रतीत होता है। लेकिन यहां पर ध्यान देने की बात यह है कि सब कुछ विधाता के यहां से पूर्व निर्धारित था।

एक समय जब पांडवो का बारह वर्ष का वनवास चल रहा था तब दुर्योधन को किसी तरह पता चल गया था कि पांडव विराट नगर के राजा के पास अपनी पहचान छुपा कर रुके हुए है सो दुर्योधन ने पांडवो को ढूंढ निकालने के लिए अपनी सेना के साथ जिसमे कर्ण और भीष्म पितामह इत्यादि का भी समावेश था।

इन सभी को साथ लेकर विराट के ऊपर आक्रमण कर दिया अर्जुन विराट के यहां एक किन्नर के रूप में रहकर विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य कौशल की शिक्षा प्रदान कर रहे थे।

कौरवो के आक्रमण का समाचार सुनकर विराट का पुत्र उत्तर कुमार अपनी सेना के साथ कौरवो से युद्ध करने के लिए चल दिया। अर्जुन खुद उत्तर कुमार सारथी बने हुए थे।

जब रण क्षेत्र में उत्तर कुमार ने दुर्योधन की विशाल सेना को देखा तो वह रणक्षेत्र से पलायन का विचार करने लगा। तब अर्जुन ने उसे समझाया तुम एक क्षत्रिय होकर पलायन करना चाहते हो यह तुम्हे शोभा नहीं देता है। तुम रथ का संचालन करो मैं तुम्हारी तरफ से युद्ध करूँगा।

तब अर्जुन ने उत्तर को एक पेड़ दिखाते हुए कहा, “तुम यह रथ उस पेड़ के नीचे ले चलो, हमारे सभी अस्त्र-शस्त्र उस पेड़ में रखे हुए है।”

तब उत्तर कुमार रथ उस पेड़ के नीचे ले गया। अर्जुन ने उस पेड़ से अपने अस्त्र-शस्त्र उतारे और विराट की सेना की तरफ से युद्ध किया और विराट की सेना को वजयी बनाकर ही दम लिया।

सारा समाचार जब विराट को मालूम हुआ तो उन्होंने खुश होकर अपनी कन्या उत्तरा का विवाह अर्जुन से करने का प्रस्ताव रखा। तब अर्जुन ने विराट से कहा, “मैंने इसे गुरु के रूप में इसे नृत्य की शिक्षा दिया है। इसके साथ हमारा विवाह संभव नहीं है क्योंकि यह हमारी पुत्री के समान है। आप चाहे तो हमारे पुत्र अभिमन्यु के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर सकते है।”

इस तरह उत्तरा जो कि अर्जुन की पत्नी होने वाली थी वह उनकी पुत्र वधू बन गई थी।

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