volga se ganga hindi book pdf free-download | वोल्गा से गंगा – राहुल सांकृत्यायन

volga se ganga hindi book pdf free-download | वोल्गा से गंगा – राहुल सांकृत्यायन | free hindi books

वोल्गा से गंगा’ राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखा हुआ एक कहानी संग्रह है, जिसकी कहानियां इतिहास में मानवीय सभ्यता के विकास में घटी घटनाओं के मद्देनजर लिखी…

Volga Se Ganga is a historical fiction  which is a collection of 20 short stories from the pen of travel writer Rahul Sanskrityayan. The book revolves around migration of Aryans from Eurasia to Volga river. The book further traces the movement of Aryans from Volga river to the regions of Himalayas, sub Himalayan region and Gangetic plains.

 The stories in the book begins from 6000 BC and ends in the year 1942. This is the year when Gandhiji called for Quit India Movement. The first story of the book is Nisha. It is woven around 6000 BC. At this time the society is of matriarchal nature so the story is named after a female head of the family. Readers will find 20 interesting stories that will make them travel between different time periods and different mentality of the society.

In the stories you will find Chanakya reign from Alexander period stories. A touch of Asian and European culture is blend in this book as well writer has try to emerge them as well. 

‘वोल्गा से गंगा’ राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखा हुआ एक कहानी संग्रह है, जिसकी कहानियां इतिहास में मानवीय सभ्यता के विकास में घटी घटनाओं के मद्देनजर लिखी गई हैं. ‘वोल्गा से गंगा’ हमारे सभ्य समाज के शुरुआती युग के मातृसत्तात्मक होने को प्रतिपादित करती है. यह संग्रह स्त्री के वर्चस्व की बेजोड़ रचना है. इस रचना में स्त्रियों के प्रदर्शन और प्रकृति के ऐसे उद्धरण हैं जो यह स्थापित करते हैं कि मातृसत्तात्मक समाज में स्त्री कितनी उन्मुक्त, आत्मनिर्भर और स्वच्छंद थीं. स्त्री किसी की संपत्ति नहीं थी. स्त्रियों के स्व-निर्णय का उस वक्त बड़ा प्राधान्य था और इसे एक स्वाभाविक क्रिया के रुप में देखा जाता था.

इस दृष्टि से ‘वोल्गा से गंगा’ की सबसे पहली कहानी ‘निशा’ विशेष रुप से उल्लेखनीय है. कहानीकार के अनुसार उस वक्त हिन्द, ईरान और यूरोप की सारी जातियाँ एक कबीले के फॉर्म में थीं. शायद यकीन करने में दिक्कत हो लेकिन उस दौरान प्रत्येक साहसिक कार्यों में स्त्रियां पहलकदमी किया करती थीं और ये कोई आश्चर्य नहीं था बल्कि एक स्वाभाविक घटना थी. इस कहानी के अनुसार मातृसत्तात्मक समाज की स्त्रियां पशु-शिकार से लेकर पाषाण-परशु और बाण चलाना, चाकू चलाना, पहाड़ चढ़ना, तैराकी, नृत्य आदि विभिन्न कलाओं में पारंगत होती थीं. बल्कि कहा जाए तो वे पुरुषों की तुलना में ज़्यादा तेज़ और साहसी होती थीं.

‘वोल्गा से गंगा’ पुस्तक में कुल बीस कहानियां हैं और उनके बीच में कुछ सौ वर्षों का अंतराल दिया गया है. इन कहानियों के मध्य परिवर्तन विश्वसनीय बन रहता है. 8000 वर्षों के समय में लेखक ने पूरे इतिहास का एक निचोड़ प्रस्तुत कर दिया है. इस कहानी संग्रह के विषय में खुद राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं कि- “लेखक की एक-एक कहानी के पीछे उस युग के संबंध की वह भारी सामग्री है, जो दुनिया की कितनी ही भाषाओं, तुलनात्मक भाषाविज्ञान, मिट्टी, पत्थर, ताँबे, पीतल, लोहे पर सांकेतिक व लिखित साहित्य अथवा अलिखित गीतों, कहानियों, रीति-रिवाजों, टोटके-टोनों में पाई जाती है.”

शायद यही वजह है कि कहानियों की शैली में पर्याप्त विविधता दिखती है. विवरण, वार्तालाप, आत्मकथा, प्रपंच आदि के माध्यम से लेखक ने लोगों की सोच को व्यक्त किया है और समाज में आते हुये बदलाव पर लोगों की प्रतिक्रियाओं को दिखाया है. पुस्तक के अंत में भदन्त आनंद कौसल्यायन ने कहानियों के स्रोतों के बारे में लिखा. वोल्गा से गंगा पुस्तक में लेखक ने आर्य आक्रमण सिद्धांत को पूरी तरह से मानते हुए उसके चारों ओर कहानियों को लिखा है, उस समय शायद यह सिद्धांत इतना विवादित न रहा हो, हालांकि पुस्तक के अंत में भदन्त आनंद कौसल्यायन ने इस पुस्तक की आलोचना के बारे में लिखा है कि किस तरह से सांकृत्यायन को नग्नवादी, ब्राह्मण विरोधी कहकर इस पुस्तक के उद्देश्य पर सवाल खड़े किये गए थे. कुछ इसी तरह की भावना इस पुस्तक के दूसरे संस्करण की भूमिका में सांकृत्यायन ने स्वयं व्यक्त किए हैं.

संग्रह की अगली चार कहानियां- पुरुधान, अंगिरा, सुदास और प्रवाहण हैं. इन कहानियों में 2000 ई. पू. से 700 ई. पू. तक के सामाजिक उतार-चढ़ावों और मानव सभ्यता के विकास को प्रकट करती हैं. इन कहानियों में वेद, पुराण, महाभारत, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों आदि को आधार बनाया गया है. 490 ई. पू. को प्रकट करती कहानी बंधुल मल्ल में बौद्धकालीन जीवन प्रकट हुआ है. इसी कहानी की प्रेरणा से राहुल जी ने ‘सिंह सेनापति’ उपन्यास लिखा था. 335 ई. पू. के काल को प्रकट करती कहानी ‘नागदत्त’ में आचार्य चाणक्य के समय की, यवन यात्रियों के भारत आगमन की यादें झलक उठती हैं.

संकलन की पंद्रहवीं कहानी बाबा नूरदीन से लेकर अंतिम कहानी सुमेर तक के बीच में लगभग 650 वर्षों का अंतराल है. मध्य युग से वर्तमान युग तक की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को अपने माध्यम से व्यक्त करती यह छह कहानियाँ- बाबा नूरदीन, सुरैया, रेखा भगत, मंगल सिंह, सफ़दर और सुमेर अतीत से उतारकर हमें वर्तमान तक इस तरह ला देती हैं कि हमें एक सफर के पूरे हो जाने का अहसास होने लगता है. इन कहानियों में भी कथा-रस के साथ ही ऐतिहासिक प्रामाणिकता इस हद तक शामिल है कि कथा और इतिहास में अंतर कर पाना असंभव हो जाता है.

अन्य कहानियों में वैदिक भारत, उत्तर-वैदिक भारत, बुद्ध के समय की कहानियां लिखी गई हैं. इस पुस्तक में जातिवाद के कारणों में जाने की कोशिश की गई है. 50 ई.पू के समय को प्रकट करती कहानी ‘प्रभा’ में अश्वघोष के बुद्धचरित और सौंदरानंद को महसूस किया जा सकता है। सुपर्ण यौधेय, भारत में गुप्तकाल अर्थात् 420 ई. पू. को, रघुवंश को, अभिज्ञान शाकुंतलम् और पाणिनी के समय को प्रकट करती कहानी है. इसी तरह दुर्मुख कहानी है, जिसमें 630 ई. का समय प्रकट होता है, हर्षचरित, कादम्बरी, ह्वेनसांग और ईत्सिंग के साथ हमें भी ले जाकर जोड़ देती है. चौदहवीं कहानी, जिसका शीर्षक चक्रपाणि है, 1200 ई. के नैषधचरित का तथा उस युग का खाका हमारे सामने खींचकर रख देती है.

पू. से लेकर 2500 ई. पू. तक के समाज का चित्रण करती हैं. उस युग के समाज का और हालातों का चित्रण करने में राहुल जी ने भले ही कल्पना का सहारा लिया हो, किंतु इन कहानियों में उस समय को देखा जा सकता है.

पुस्तक की आखिरी कहानियों में लेखक ने साम्यवाद को भारत की बुराइयों के हल के रूप में प्रस्तुत किया है. उस समय सोवियत संघ की कहानियों को सुनकर एक बार लग सकता है कि सामन्तवादी व्यवस्था का अन्त हो गया था और शासन का एकमात्र उद्द्येश्य लोगों का कल्याण था. जातिवाद और आय में घोर असमानता जैसी समस्याओं का हल साम्यवाद कहा गया है. इतने वर्ष बीत जाने के बाद पीछे मुड़कर देखा जाए तो सोवियत के साम्यवाद को पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता. निरंकुशता किसी भी तरह की हो उसे सराहनीय नहीं कहा जा सकता है. यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ में साम्यवाद को अच्छे से लागू न किया गया हो. लेकिन इसके माध्यम से सांकृत्यायन ने दबे कुचले वर्ग की समस्याओं को एक आवाज दी है.


पहला, बौद्ध और जैन धर्म के ग्रंथों में देवताओं की अत्यधिक प्रशंसा की जगह उस समय के वास्तविक सामाजिक स्थितियों का चित्रण किया गया है. दूसरा किसी एक ग्रंथ की बातों को किसी दूसरे ग्रंथ से तुलना करके उसकी सच्चाई जानी जा सकती है.
राहुल सांकृत्यायन के अनुसार पहले आर्य जातियों में कार्य का विभाजन नहीं था. हर एक मनुष्य हर एक कार्य कर सकता था. जब आर्य जातियां भारतीय उपमहाद्वीप में आईं, तो उन्होंने व्यापार प्रधान समुदायों को देखा जहां एक मुखिया के पास अत्यधिक शक्ति केंद्रित रहती थी. आर्यों में सत्ता लोभी लोगों ने इस व्यवस्था को अपना लिया था. धीरे धीरे यह व्यवस्था अपनी जड़ मजबूत करती गयी और इसको बदलना लगभग असम्भव हो गया. आर्यों और गैर-आर्यों के बीच के युद्धों को लेखक ने अपने शब्दों में व्यक्त किया है, जिसके कुछ कुछ उल्लेख महाग्रंथों में मिलते हैं. मध्यकाल तक पिछड़ी जातियों में उच्च जातियों के प्रति इतना क्षोभ आ गया था कि उन्होंने विदेशी शासन को भी अच्छा माना है.

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